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Sunday, 3 August 2014

चूल्हा


तुम्हे जलाये रखने के लिए-
रामू के बापू की हड्डियां जलीं है.
सुलगती लकडियो के उठते धुएं से- 
रामू के माँ की पुतलिया जलीं है.
घुटन में बैठी , दमे से खांसती -
फेफड़े की इक इक
पसलिया हिली है.
जब भी तुम ना जल सके तो-
घर भर की

अतड़िया जलीं है..

मैं ढूंढ रहा हूँ मानव

मैं ढूंढ रहा हूँ मानव
दर दर भटका हूँ,
अनवरत प्रयास की प्रेरणा मैंने अमानुष से ली.
कई मानव मिले,
लेकिन,
संपूर्ण मानवता को समर्पित,
मानव की तलाश जारी है.
जो कुछ अर्थो मे मानवता की सीमाओ का सामीप्य लिए है,
वो अमनुषो के बीच,
अपने आप को अकेला ढ़ोने में लगे है,
सब तरफ  अराजकता की मूर्तियों , प्रति-मूर्तियों और पुजारियों का मेला लगा है,
बेहतर है की,

मानवता का अर्थ, अभिप्राय , परिभाषा बदल दो.

स्वागत कक्ष की मूर्ति की तरह के लोग

स्वागत कक्ष में रखी धात्विक मूर्ति की तरह ,
निष्प्राण, मूक, बधिर, निर्दोष-
वो
जाने कितने वर्षो पुरानी ढ़ाल की तरह,
तलवार के वारों के खरोंच के निशान-
अपने सीने से लगाये ,
अपने ऊपर हुए आक्रमणों की याद समेटे ,
डायनासोर की तरह अपना अस्तित्व खो चुके है।
सच का लावा उगलने वाली जिह्वा,
सुसुप्त ज्वालामुखी की तरह,
काले कीचड के ढेर से ढक गयी है.
अनाज बरसाने वाली जमीन-
जैसे अकाल में कट फट जाती है,
दरिद्रता दर्शाती है,

वो भी कुछ जाने तो कुछ अनजाने में अपनी धनराशि खो बैठे है।

Sunday, 22 December 2013

मैं मानव हूँ

मैं मानव हूँ

मेरी गली में भोंकते आवारा कुत्ते ,
चहलकदमी करते सूअर ,
रम्हाती बिन खूंटे की गायें ,
मुझे एहसास करा देती हैं

कि मैं मानव हूँ।

भाइयों से सम्पत्ति के बटवारे की लड़ाई ,
रामलाल से प्रमोशन का झगड़ा ,
ठेले वाले से सब्जी के मोल भाव की नोंक झोंक,
पल भर के लिए भू जाता हूँ ,
दूर मंदिर में बजती घंटियाँ ,
मुझे याद दिला देती हैं ,


कि मैं मानव हूँ।

इधर उधर की

इधर उधर की 

पलकें जो मुंद जाती है तो
हो जाती है जिंदगानी कैद ,
पलकों का हिलना है आगाज़ किसी कहानी का। 
पलके जो उठ जाएँ तो
फलक भी हो जाता है बेचैन,
लरजती पलकों पे बोझ है
कई जिंदगानी का।

पुतलियों में झिपी है लहू कि रवानी ,
नैनों की झील में डूबी है जिंदगानी।

जमाने से लड़ता बगावत भी करता
गर मेरे सितारे गर्दिश में होते ,
दिल पे क्या गुजरी है तुमको सुनाता 
गर जमाने कि बंदिश में होते।

रफ्ता-रफ्ता दिन कटते थे
वो चैन उड़ा कर  चले गए।
पहले ही ग़म कम ना थे
वो और बढ़ा कर चले गए।

अंगड़ाई ले के उसने पुकारा जो मेरा नाम ,
ज़ेहन से उठी हूंक और मैं हो गया बेनाम।

जिन्हें सौंप दी थी सारी जिंदगी
वो ही पड़ गए है मेरी जान के पीछे।

मंदिर में बैठ के पिया,
गहरे पानी में पैठ के पिया ,
मज़ा पीने का लेकिन ,
तेरे हाथों से ही है साक़िया। 

या खुदा बता दे इस दीवाने को,
ये दुनिया बुरा क्यूँ मानती है पैमाने को। 

ऐ  साकी छलकने दे जाम आज की रात,
आज मेरे दिलनवाज़ की शादी है। 
पिलाये जा बिन रुके आज़ की रात,
अभी तो हलक में जान बाकी है। 

दीवानगी का आलम दुनियाँ को नहीं भाता है,
क्योंकि 
हर साख़ पे दीवाने को ऊल्लू ही नज़र आता है। 

ऊँगली पकड़ के जिनको चलना सिखाया था 
वो कह रहे हैं तुमको आता ही क्या है। 
जिन्हे जिंदगी का सलीक़ा सिखाया था 
वो कह रहे हैं तुमको आता ही क्या है। 

जिनसे है मुलाक़ात बस एक रात की 
कहते हैं रास्ते नहीं कटेंगे मेरे बग़ैर। 

जिसको सहेज कर नियामत से रखा था 
जब देखा तो निकला वो तन्हाईओं का ढ़ेर। 

दीवानगी में क़दमों में सर भी रख दिया ,
वो मुस्कुराये और.… ठोकर लगा के चल दिए। 

नज़र में शोखियां हों तो फ़रिश्ते भी मचल जाए,
तेरे एक  इशारे पे खुदा की भी नीयत बदल जाए।  

मुद्द्त के बाद दिया जला है- और हुआ है जहां रौशन ,
अक्सर आते है वो ऐसे में ही तूफाँ बनकर। 

रफ़ता रफ़ता दिन कटते थे, चैन उड़ा के चले गए,
पहले ही ग़म कम ना थे, वो और बढ़ा के चले गए। 

लाख़ की चूड़ियाँ खनकेंगी तो मन मचलेगा ही ,
ऐसे में कहते हो कि आज़ नहीं और कभी। 
ख्वाहिशों को अब ज़ुबान मिल ही गयी,
दिल मेरा कहता है और अभी और अभी। 

जमीं  का ज़र्रा ज़र्रा उनके हुस्न का क़ायल है,
हवा का इक इक झोंका अंगड़ाईयों से घायल है। 

निशा में तेरे यौवन की छटा देदीप्यमान है,
खूबसूरती के धरातल पे तू आसमान है। 

उसने जी भर के कोसा और ताने दिए,
अब तो हद हो गयी बेवफ़ा कह दिया। 
लाश भी कब्र में अब तो चुप ना रही,
और ये कह पड़ी - बेवफ़ा मैं नहीं ,
 बेवफ़ा मैं नहीं। 

जुल्फें तूने लहराकर दिन में ही रात कर दी ,
बरसों से जो ख्वाहिश वो बात आज कर दी। 

चाँद पे तेरे लिए एक घर बनवाऊंगा 
और 
मेरी हर जिद फिर वही पे मनवाऊँगा। 




  

Saturday, 7 December 2013

दीवाली

अबकी दीवाली में फिर जले दिए।
फिर फूटे पटाखे…
फिर खिलखिलाए बच्चे।
लाखो इधर उधर हो जायेंगे
लाखों का हो जाएगा वारा न्यारा।
दूर से....
सहमे सहमे
बच्चों को फुलझड़िया जलाता देख
धीरे  धीऱे...
 उसके आँखों में चमक गयी। 
मानो उसके अपने हाथों में हैं फुलझड़िया।
अगल-बगल के घरो में जलते दीये,
मानो उसके घर में ही जल रहे हैं।
उसे  भी मिली आज खाने को मिठाई,
वो खुश हुआ,
साल में पहली बार। 
आखिर दीवाली है आज।

खुशियो का त्यौहार-
दीवाली।  

घाटी



ये हसीन वादियाँ जिनमें गुन्जती थीं प्यार की  बोली
सुनाई देती है अब चीख- पुकार, आवाज़े गोली।
लाल-लाल फूलो की वादियाँ लाल रहे फिर भी लाल हो गईं 
दरख़्त तो दरख़्त पत्ते तक कटीले हो गए,
इनको सहलाने से अब हाथ ही छिलेंगे।
डालियों से बारूद की बू आती है,
पूरी की पूरी घाटी मौत का जाल हो गई।
अबके पतझड़ में जड़ो तक पानी पहुचाना है,
क्योंकि,
फिर से एक बार कोपलें ज़रूर फूटेंगी,
फिर से एक बार घाटी में सदाए गूंजेंगी।