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Sunday, 22 December 2013

मैं मानव हूँ

मैं मानव हूँ

मेरी गली में भोंकते आवारा कुत्ते ,
चहलकदमी करते सूअर ,
रम्हाती बिन खूंटे की गायें ,
मुझे एहसास करा देती हैं

कि मैं मानव हूँ।

भाइयों से सम्पत्ति के बटवारे की लड़ाई ,
रामलाल से प्रमोशन का झगड़ा ,
ठेले वाले से सब्जी के मोल भाव की नोंक झोंक,
पल भर के लिए भू जाता हूँ ,
दूर मंदिर में बजती घंटियाँ ,
मुझे याद दिला देती हैं ,


कि मैं मानव हूँ।

इधर उधर की

इधर उधर की 

पलकें जो मुंद जाती है तो
हो जाती है जिंदगानी कैद ,
पलकों का हिलना है आगाज़ किसी कहानी का। 
पलके जो उठ जाएँ तो
फलक भी हो जाता है बेचैन,
लरजती पलकों पे बोझ है
कई जिंदगानी का।

पुतलियों में झिपी है लहू कि रवानी ,
नैनों की झील में डूबी है जिंदगानी।

जमाने से लड़ता बगावत भी करता
गर मेरे सितारे गर्दिश में होते ,
दिल पे क्या गुजरी है तुमको सुनाता 
गर जमाने कि बंदिश में होते।

रफ्ता-रफ्ता दिन कटते थे
वो चैन उड़ा कर  चले गए।
पहले ही ग़म कम ना थे
वो और बढ़ा कर चले गए।

अंगड़ाई ले के उसने पुकारा जो मेरा नाम ,
ज़ेहन से उठी हूंक और मैं हो गया बेनाम।

जिन्हें सौंप दी थी सारी जिंदगी
वो ही पड़ गए है मेरी जान के पीछे।

मंदिर में बैठ के पिया,
गहरे पानी में पैठ के पिया ,
मज़ा पीने का लेकिन ,
तेरे हाथों से ही है साक़िया। 

या खुदा बता दे इस दीवाने को,
ये दुनिया बुरा क्यूँ मानती है पैमाने को। 

ऐ  साकी छलकने दे जाम आज की रात,
आज मेरे दिलनवाज़ की शादी है। 
पिलाये जा बिन रुके आज़ की रात,
अभी तो हलक में जान बाकी है। 

दीवानगी का आलम दुनियाँ को नहीं भाता है,
क्योंकि 
हर साख़ पे दीवाने को ऊल्लू ही नज़र आता है। 

ऊँगली पकड़ के जिनको चलना सिखाया था 
वो कह रहे हैं तुमको आता ही क्या है। 
जिन्हे जिंदगी का सलीक़ा सिखाया था 
वो कह रहे हैं तुमको आता ही क्या है। 

जिनसे है मुलाक़ात बस एक रात की 
कहते हैं रास्ते नहीं कटेंगे मेरे बग़ैर। 

जिसको सहेज कर नियामत से रखा था 
जब देखा तो निकला वो तन्हाईओं का ढ़ेर। 

दीवानगी में क़दमों में सर भी रख दिया ,
वो मुस्कुराये और.… ठोकर लगा के चल दिए। 

नज़र में शोखियां हों तो फ़रिश्ते भी मचल जाए,
तेरे एक  इशारे पे खुदा की भी नीयत बदल जाए।  

मुद्द्त के बाद दिया जला है- और हुआ है जहां रौशन ,
अक्सर आते है वो ऐसे में ही तूफाँ बनकर। 

रफ़ता रफ़ता दिन कटते थे, चैन उड़ा के चले गए,
पहले ही ग़म कम ना थे, वो और बढ़ा के चले गए। 

लाख़ की चूड़ियाँ खनकेंगी तो मन मचलेगा ही ,
ऐसे में कहते हो कि आज़ नहीं और कभी। 
ख्वाहिशों को अब ज़ुबान मिल ही गयी,
दिल मेरा कहता है और अभी और अभी। 

जमीं  का ज़र्रा ज़र्रा उनके हुस्न का क़ायल है,
हवा का इक इक झोंका अंगड़ाईयों से घायल है। 

निशा में तेरे यौवन की छटा देदीप्यमान है,
खूबसूरती के धरातल पे तू आसमान है। 

उसने जी भर के कोसा और ताने दिए,
अब तो हद हो गयी बेवफ़ा कह दिया। 
लाश भी कब्र में अब तो चुप ना रही,
और ये कह पड़ी - बेवफ़ा मैं नहीं ,
 बेवफ़ा मैं नहीं। 

जुल्फें तूने लहराकर दिन में ही रात कर दी ,
बरसों से जो ख्वाहिश वो बात आज कर दी। 

चाँद पे तेरे लिए एक घर बनवाऊंगा 
और 
मेरी हर जिद फिर वही पे मनवाऊँगा। 




  

लाल रंग

और वो लगातार तीसरे साल फ़ेल हो गई।उसे ऐसा लगा जैसे 12वी क्लास एक लड़का है और मुह चिढाकर बोल रहा है "हम तुमसे जुदा हो के, मर जायेगे रो रो के "। उसके पिता तो क्या सब सारे घर वाले परेशान। वो समझदार थी और घर में सब लोग उसके व्यवहार से ख़ुश रहते थे। बस उसके फेल होने  से सब को दुःख होता था। उसके पिता को उसकी शादी की चिंता उसके फेल होने से ज्यादा सताती थी। आज कल बी से कम पढ़ी लड़की की शादी करना कितना मुश्किल होता है। दहेज़ कि मांग ज्यादा तो होती ही है , अच्छा लड़का मिलना भी मुश्किल होता है।पिता ज्यादा दहेज़ भी नहीं दे सकते थे और लड़की ज्यादा पढ़ी लिखी थी नहीं ।  परेशान से वो दहेज़ प्रथा को कोसते रहते थे। काफी मेहनत मशक्कत के बाद आखिरकार एक लड़का मिल ही गया जिसके घर वाले १२ वीं फ़ेल लड़की से शादी को तैयार हो गए। अपने प्रयास से पिता का सीना फूले नहीं समा रहा था।  आखिर वो दिन आ गया जब बला जैसी लगने वाली लड़की को विदा करने का वक्त आ गया। विदाई की घडी में बाप के आखों से आंसू की गंगा जमुना बह रही थी।

बेटी को विदा कर बाप ने ठंडी सांस ली और बेटी भी बहुत खुश कि चलो अब पढाई और परीक्षा से पीछा छूटा। लेकिन उसकी ख़ुशी ज्यादा देर तक उसका दामन पकड़ सकी। उसके पति और उसके ससुराल में सबने उससे साफ़ साफ़ कह दिया कि बहु तो बेटी कि तरह है और उसे वो ग्रेजुएट तो बना के ही दम लेंगे।  सबके प्यार और दुलार वाली जिद ने उसे आगे पढ़ने पर मजबूर कर दिया। पढाई के नाम से ही उसे सिहरन उठने लगती थी और मार्कशीट पर लाल रंग से " फेल्ड " लिखा शब्द उसके आँखों के सामने घूमने लगता था। बार बार उसे "प्रेम नगर" फ़िल्म का गाना याद आता था " ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा"


बड़ी मुश्किल से उसने परीक्षा दिया और बेमन से परिणाम का इन्तजार करने लगी।  चमत्कार हो गया, उसका रोल नंबर पास वाली लिस्ट में छपा हुआ दिख गया। किस श्रेणी में , कितने मार्क्स आये उससे उसे कोई लेना देना नहीं था। उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था।  आखिर कई साल की मेहनत और मन्नत के बाद वो पास जो हो गयी थी। बड़े खुशनुमे अंदाज के साथ अपनी मार्कशीट लेने खुद स्कूल गयी।  ये क्या , मार्कशीट में फिर से "फेल्ड " लिखा था। उसे लगा जैसे लाल रंग उसे कह रहा हो " जन्म जन्म का साथ है हमारा तुम्हारा, हमारा तुम्हारा। " और उसने मार्कशीट फाड़ कर फेंक दिया।